कभी डर लगा है एक पल में सब कुछ खो देने का, सारे सपने और सारी ख्वाहिसे टूट ने का, डर लगा है कभी खुद को खो देने का?
गिर कर उठने का और उठ कर चलनेका, साथ कीसी के ना होते हुवे भी आगे बढ़ाने का, लहरों के साथ किनारे को छोड़ ने का, डर लगा है कभी गहरे समन्दर में तैर ने का?
उचाईयो पे चड़ के दुनिया को पाने का या खुद मे ही खो के खुद को पाने का, जिंदगी की इस धूप छाव में, कभी अपनो का तो कभी अजनबियों का, कभी जूठी हंसी तो कभी जूठे आंसुओ का, क्या डर लगा है कभी तुम्हे खुल के जीने का?
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